Title :-Chhaayaavaadee Kaavy mein Paryaavaraneey Drshti aur Chintan Download Pdf
Author :-Suniti Tyagi/Dr. Poonam Sharma
Date of Publication (ONLINE) :-27-04-2026
DOI- 10.71037/Shodhaamrit.v3i2.06
Online Publication Certificate No. :– SMT/3206
cite this article:
Tyagi Suniti/Sharma Dr. Poonam, “Chhaayaavaadee Kaavy mein Paryaavaraneey Drshti aur Chintan”, Published in SHODHAAMRIT(शोधामृत), ISSN-3048-9296(O) & 3049-2890(P), Volume-3 | Issue-2, April-June, 2026, Page No. :-28-31. URL: https://shodhaamrit.gyanvividha.com/wp-content/uploads/2026/04/Suniti-tyagi-Dr.-punam-sharma-Shodhaamrit-Vol-3-Issue-2-april-June-2026-pp-28-31.pdf
Abstract : प्राचीन भारतीय संस्कृति के ऋषि-मुनियों ने वृक्ष, जल, भूमि इत्यादि को स्वंय से बढकर माना है। उनका मानना था कि हमारा शरीर पंचतत्वों से मिलकर बना है अगर हम एक भी महाभूत को पूरी तरह से नष्ट कर देते है तो उसका दूषित प्रभाव हमारे जीवन पर भी जरूर होगा। इसलिए प्राचीनकाल में मानव ने अपने जीवन के संरक्षण के लिए पर्यावरण के साथ अपने संबंध स्थापित किए मानव और प्रकृति का समन्वय तब से आज तक चला आ रहा है। उदाहरण के तौर पर हम देख सकते है कि मानव का नदियों के समीप अपने निवास स्थान बनाना, अस्थि प्रस्तर उपकरण का प्रयोग करना आदि हो सकते है। मानव के निर्मित शैलाश्रयों और गुफाओं में अनेक ऐसे प्रागैतिहासिक चित्र मिले है जिनसे पता चलता है कि मानव सभ्यता को इन सबको ज्ञान हो चुका था कि हमारा जीवन प्रकृति की समीप रहने से अधिक खुशहाल और समृद्ध हो सकता है। यही भावना हम आधुनिक काल के छायावाद युग के कवियों में देखते है। छायावादी काव्य की रचनाएं प्रकृति के समीप हैं जिनमें प्रकृति का विलक्षण प्रभाव और प्रकट करने की तीव्र भावना देखने को मिलती है।
Keywords : विलक्षण, सहस्त्राब्दियों, वात्सल्यमय, नैसर्गिक, तादात्म्य।
Publication Details:
Journal : SHODHAAMRIT(शोधामृत)
ISSN : 3048-9296 (Online) & 3049-2890 (Print)
Published In : Volume-3 | Issue-2, April-June, 2026
Page Number(s) : 28-31
Publisher Name :
Mrs Anubha Chaudhary | https://shodhaamrit.gyanvividha.com | ISSN-3048-9296(O) & 3049-2890(P)



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