SHODHAAMRIT (शोधामृत)

An International Peer-Reviewed, Refereed, Indexed & Quarterly Research Journal of Arts, Humanities and Social Sciences

A Multidisciplinary and Multilingual (All Languages) Journal Publishing Original Scholarly Research in the All Subjects Of Arts, Humanities and Social Sciences in Online and Print Formats.
E-ISSN: 3048-9296 & P-ISSN : 3049-2890

IIFS Impact Factor-5.375

Journal DOI: https://doi.org/10.71037/Shodhaamrit

SUBMIT YOUR ARTICLE

Sanskrit Vangmaya mein Vivechit Saraswati Nadi ke Vaigyanik Sandarbh

Title :-Sanskrit Vangmaya mein Vivechit Saraswati Nadi ke Vaigyanik Sandarbh Download Pdf
Author :-Balram/Dr. Devendra Singh Rajput


Date of Publication (ONLINE) :-11-05-2026
DOI- 10.71037/Shodhaamrit.v3i2.24
Online Publication Certificate No. :– SMT/3224

cite this article:
Balram/Rajput Dr. Devendra Singh, “Sanskrit Vangmaya mein Vivechit Saraswati Nadi ke Vaigyanik Sandarbh“, Published in SHODHAAMRIT(शोधामृत), ISSN-3048-9296(O) & 3049-2890(P), Volume-3 | Issue-2, April-June, 2026, Page No. :-151-159. URL: https://shodhaamrit.gyanvividha.com/wp-content/uploads/2026/06/Balram-Dr.-Devendr-singh-rajput-Shodhaamrit-Vol-3-Issue-2-april-June-2026-pp-151-159.pdf

Abstract : भारतीय वैदिक एवं उत्तरवैदिक साहित्य में सरस्वती नदी का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान है। वैदिक ऋषियों ने सरस्वती को केवल एक सामान्य नदी के रूप में नहीं अपितु ज्ञान, संस्कृति, समृद्धि और सभ्यता की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में देखा है। ऋग्वेद में सरस्वती को ‘नदीतमा’, ‘अम्बितमा’ तथा ‘देवितमा’ जैसे विशेषणों से अलंकृत किया गया है, जिनसे उसके महान् स्वरूप का परिचय प्राप्त होता है। ‘नदीतमा’ का अर्थ है – नदियों में श्रेष्ठ, ‘अम्बितमा’ अर्थात् मातृस्वरूपा तथा ‘देवितमा’ अर्थात् देवस्वरूपिणी। इन विशेषणों से स्पष्ट होता है कि वैदिक युग में सरस्वती केवल जलधारा न होकर सम्पूर्ण सिंधु घाटी सभ्यता के जीवन का आधार थी। ऋग्वेद के अनेक सूक्तों में सरस्वती का वर्णन एक विशाल, वेगवती तथा जीवनदायिनी नदी के रूप में प्राप्त होता है। संस्कृत वाङ्मय में सरस्वती केवल धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि एक महत्त्वपूर्ण वैज्ञानिक सत्ता के रूप में भी वर्णित है। वैदिक ग्रन्थों के आधार पर विद्वानों ने सरस्वती के प्रवाह-पथ की पहचान वर्तमान घग्घर-हकरा नदी प्रणाली से की है। माना जाता है कि प्राचीन काल में हिमालय से निकलने वाली सतलुज तथा यमुना की कुछ धाराएँ सरस्वती में मिलती थीं जिसके कारण यह अत्यन्त विशाल नदी थी। कालान्तर में भूगर्भीय परिवर्तनों के कारण इन नदियों ने अपना मार्ग बदल लिया और सरस्वती जलहीन होने लगी। आधुनिक भूगर्भशास्त्र ने भी इस तथ्य की पुष्टि की है कि उत्तर-पश्चिम भारत में प्राचीन काल में एक विशाल नदी प्रवाहित होती थी। उपग्रह चित्रण (Satellite Imagery) द्वारा राजस्थान, हरियाणा तथा पाकिस्तान के चोलिस्तान क्षेत्र में सूखी नदी की प्राचीन धारा के चिन्ह प्राप्त हुए हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) तथा अन्य वैज्ञानिक संस्थाओं द्वारा किए गए अनुसंधानों में यह स्पष्ट हुआ है कि घग्घर-हकरा क्षेत्र में प्राचीन नदी का विस्तृत प्रवाह-पथ विद्यमान था। उपग्रह चित्रों में सूखी नदी की चौड़ी धारा दिखाई देती है, जो किसी विशाल नदी के अस्तित्व का प्रमाण प्रस्तुत करती है। पुरातत्त्वीय अनुसंधानों ने भी सरस्वती नदी के ऐतिहासिक अस्तित्व को बल प्रदान किया है। हड़प्पा सभ्यता के अनेक नगर सरस्वती नदी के तटवर्ती क्षेत्रों में प्राप्त हुए हैं। राखीगढ़ी, कालीबंगन, बनावली तथा लोथल जैसे प्राचीन नगर इसी नदी प्रणाली से सम्बद्ध माने जाते हैं। यह तथ्य विशेष उल्लेखनीय है कि हड़प्पा सभ्यता के अधिकांश नगर सिंधु की अपेक्षा सरस्वती क्षेत्र में अधिक संख्या में पाए गए हैं। इससे विद्वानों ने ‘सिन्धु-सरस्वती सभ्यता’ की संकल्पना प्रस्तुत की है। जलविज्ञान (Hydrology) के अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि प्राचीन सरस्वती नदी हिमालयी हिमनदों से पोषित होती थी। किन्तु जलवायु परिवर्तन, वर्षा में कमी तथा भूगर्भीय हलचलों के कारण उसका जलस्रोत धीरे-धीरे समाप्त होने लगा। भूगर्भीय अनुसंधानों से यह भी ज्ञात हुआ है कि लगभग 2000 ईसा पूर्व के आसपास इस क्षेत्र में जलवायु परिवर्तन हुआ जिसके कारण नदियों का प्रवाह प्रभावित हुआ। परिणामस्वरूप सरस्वती का अधिकांश भाग शुष्क हो गया और वह धीरे-धीरे विलुप्तप्राय हो गई। पेलियोक्लाइमेट (Paleoclimate) अर्थात् प्राचीन जलवायु के अध्ययन से भी सरस्वती नदी के विलुप्तीकरण की प्रक्रिया को समझने में सहायता मिली है। वैज्ञानिकों ने मिट्टी, अवसाद (Sediments), भूस्तरीय संरचनाओं तथा कार्बन परीक्षणों के माध्यम से यह निष्कर्ष निकाला कि प्राचीन काल में उत्तर-पश्चिम भारत का यह क्षेत्र अधिक आर्द्र था। किन्तु समय के साथ जलवायु शुष्क होती गई जिससे नदी का प्रवाह कम होता गया। संस्कृत वाङ्मय और आधुनिक विज्ञान के तुलनात्मक अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि वैदिक साहित्य में वर्णित सरस्वती कोई काल्पनिक नदी नहीं थी, बल्कि उसका वास्तविक भौगोलिक अस्तित्व था। वैदिक ऋषियों ने जिस विशाल नदी का वर्णन किया है, आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधान उसी के भौतिक प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। यह तथ्य भारतीय ज्ञानपरम्परा की वैज्ञानिक दृष्टि को भी प्रमाणित करता है।


Keywords : सरस्वती नदी, संस्कृत वाङ्मय, भूगर्भशास्त्र, उपग्रह चित्रण, पुरातत्त्व, वैज्ञानिक संदर्भ।

Publication Details:
Journal : SHODHAAMRIT(शोधामृत)
ISSN : 3048-9296 (Online) & 3049-2890 (Print)
Published In : Volume-3 | Issue-2, April-June, 2026
Page Number(s) : 151-159
Publisher Name :
 Mrs Anubha Chaudhary | https://shodhaamrit.gyanvividha.com | ISSN-3048-9296(O) & 3049-2890(P)

Loading Viewer…

Author

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *