SHODHAAMRIT (शोधामृत)

An International Peer-Reviewed, Refereed, Indexed & Quarterly Research Journal of Arts, Humanities and Social Sciences

A Multidisciplinary and Multilingual (All Languages) Journal Publishing Original Scholarly Research in the All Subjects Of Arts, Humanities and Social Sciences in Online and Print Formats.
E-ISSN: 3048-9296 & P-ISSN : 3049-2890

IIFS Impact Factor-5.375

Journal DOI: https://doi.org/10.71037/Shodhaamrit

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Renu ki ‘Raspriya’ aur Laukik Prem

Title :-Renu ki ‘Raspriya’ aur Laukik Prem Download Pdf
Author :-Dr. Shweta Dipti

Date of Publication (ONLINE) :-15-07-2026
DOI- 10.71037/Shodhaamrit.v3i3.13
Online Publication Certificate No. :– SMT/33
13

cite this article:
Dipti Dr. Shweta, “Renu ki ‘Raspriya’ aur Laukik Prem“, Published in SHODHAAMRIT(शोधामृत), ISSN-3048-9296(O) & 3049-2890(P), Volume-3 | Issue-3, July-Sept., 2026, Page No. :-85-91. URL: https://shodhaamrit.gyanvividha.com/wp-content/uploads/2026/08/Dr.-Shweta-dipti-Shodhaamrit-Vol-3-Issue-2-July-Sept.-2026-pp-85-91.pdf

Abstract : साहित्य कभी मरता नही है और न ही आउट आफ फैशन होता है। वो भी उस हालत में जब कोई साहित्यकार कालजयी हो। एक सशक्त, संवेदनशील बुद्धिजीवी वह प्रकाशपुंज होता है जिसे जाने के पश्चात् याद करने पर यह हर्ष भी होता है कि एक समय हमारा समाज ऐसी महान विभूति के स्नेह से सिंचित रहा, और कहीं एक क्लेश भी होता है कि आज ऐसे लेखक कहाँ हैं। चेखव ने कहा था, कुछ लोग जीवन में बहुत भोगते सहते हैं — ऐसे आदमी ऊपर से बहुत हल्के और हँसमुख देते हैं। वे अपनी पीड़ा दूसरों पर नहीं थोपते, क्योंकि उनकी शालीनता उन्हें अपनी पीड़ा का प्रदर्शन करने से रोकती है। रेणु ऐसे ही शालीन व्यक्ति थे। पता नहीं जमीन की कौन सी गहराई से उनका हल्कापन उभर आता था, यातना की कितनी परतों को फोड़कर उनकी मुस्कुराहट में बिखर जाता था। उनके लम्बे बाल, एक संक्षिप्त और सहज मुस्कान जो अभिजात्य सौजन्य से भीगी रहती थी। यह था सीधे शब्दों में रेणु का व्यक्तित्व। किन्तु सच तो यह है कि रेणु के सम्पूर्ण व्यक्तित्व को कोई भी और किसी की भी लेखनी पूर्ण परिभाषित नहीं कर सकती। रेणु के लेखन की सत्यता उसे अन्य लेखकों से भिन्न करती है। प्रेमचंद ने भी ग्रामीण जीवन के विषय में लिखा और बहुत ज़मीनी सत्य लिखा परंतु रेणु की शैली में विचित्र–सी अबोध सत्यता है। रेणु के लेखन में सत्य, संवेदना के अलावा एक नया पक्ष है– स्वर और संगीत का।

प्रस्तुत शोध आलेख में रेणु की कहानी ‘रसप्रिया’ के परिदृश्य में लौकिक प्रेम और समाज से विलुप्त होती लोक संगीत की पीड़ा पर दृष्टिपात किया गया है। लोक गीतों में किसी भी समाज की आत्मा बसती है। समाज का वास्तविक रूप अगर देखना हो तो लोकगीतों की दुनिया में जाइए वहाँ आपको उसके दर्शन हो जाएँगे। धरती की उसर होते जीवन में ये लोकगीत ओएसिस की तरह आशा एवं उम्मीद जगाने का काम करते हैं। साथ ही प्रस्तुत आलेख में रेणु रचित कहानी रसप्रिया में समाज की विद्रुपताओं पर भी चर्चा की गई है।

Keywords : रसप्रिया, सौन्दर्य–बोध, अवर्ण, अपरूप–यौवन, जन–संस्कृति, लोकरस, विपन्न, सामंती मूल्य व्यवस्था, संवेदनात्मक, थेथरई।

Publication Details:
Journal : SHODHAAMRIT(शोधामृत)
ISSN : 3048-9296 (Online) & 3049-2890 (Print)
Published In : Volume-3 | Issue-3, July-Sept., 2026
Page Number(s) : 85-91
Publisher Name :
 Mrs Anubha Chaudhary | https://shodhaamrit.gyanvividha.com | ISSN-3048-9296(O) & 3049-2890(P)

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